Community post
आवाज़ समाअत तक पहुंची ही नहीं शायद
ये दर्द तो आँखों से हरबार झलकता है
वो दर्द की सूरत ही मरे दिल में उबलता है
दुनिया में रहो लेकिन दुनिया ना रहे दिल में
इन्सान के ग़म में जो आँखों से छलकता है
ज़हनों के मरासिम थे इक साथ भी हो जाते
जाये ना मगर दिल से एक प्यार निकलता है
आवाज़ समाअत तक पहुंची ही नहीं शायद
वो वर्ना तसल्ली को कुछ देर दहकता है
जब आईने में सूरत धुँदली सी दिखाई दे
फिर धूल की वादी से इन्सान दमकता है
इस मेरी ज़मीं पे अब यही दर्द कहानी है
कुछ क़िस्से हैं माज़ी के , कुछ लोग कड़कता है
इक रोज़ तो लूटेंगे वशमा तरी गलीयों में
आएँगे कसम से हम तिरा प्यार चमकता है
Replies (0)
Conversation
No replies yet
Replies will appear here as people join the conversation.