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भारत में हमारी आंखों के सामने क्रांतिकारी परिवर्तन हो रहे हैं. ***

विश्व के कई राष्ट्रों की गरीबी, भ्रष्टाचार और सत्ता पे एक परिवार के एकाधिकार को बारीकी से देखने और अध्ययन करने के बाद मेरा यह मानना है कि भारत को इस दुःश्चक्र से निकलने के लिए इन परिवारों और उनके द्वारा पोषित अभिजात वर्ग का रचनात्मक विनाश करना ही पड़ेगा. कारण यह है कि ये "राजपरिवार" जनता को लॉलीपॉप (फ्री बिजली, पानी और लागत से कम रेल और बस टिकट इत्यादि) और स्लोगन (सामाजिक न्याय; धर्मनिरपेक्षता; आरक्षण इत्यादि) के द्वारा मूर्ख बनाते है, उन्हें जानबूझकर दीन-हीन और गरीब बनाये रखते है जिससे वे "मूर्ख" कुछ टुकड़ो के लिए उस अभिजात वर्ग को सत्ता में बनाये रखते है.
नहीं तो स्वतंत्रता के सात दशक बाद भी भारत भयंकर गरीबी, गन्दगी, बीमारी का बोझ, भ्रष्टाचार, अपर्याप्त विकास और औद्योगीकरण की समस्या से जूझता नहीं रहता. 80 प्रतिशत रोजगार अनौपचारिक क्षेत्र में थे; यानी कि कोई प्रोविडेंट फंड नहीं, कोई स्वास्थ्य और जीवन बीमा नहीं, कोई पेंशन नहीं. अगर कोई गरीब बीमार हो जाए तो न केवल उसे उपचार का पैसा देना होगा, बल्कि साथ ही काम पे नहीं जाने या रोजगार नहीं मिलने के कारण बीमारी के समय पगार भी नहीं मिलेगी. यानि कि दोहरी मार.
ऊपर से हमारा टैक्स सिस्टम ऐसा कि प्रत्येक व्यवसायी को घूस देनी होगी क्योकि उसके बिज़नेस की नींव ही कुछ नियमो को तोड़कर पड़ी है; माल की वैल्यू कम दिखाकर, प्रॉफिट कम घोषित करकर, कही पर टैक्स न देकर व्यवसायी सदैव के लिए टैक्स कर्मचारियों को घूस देने के लिए विवश हो जाता है. चूंकि माल की "कीमत" और "प्रॉफिट" कम है, बिज़नेस बढ़ाने के लिए उसे बैंक से पर्याप्त लोन नहीं मिल पाता.
अब उपाय के नाम पर लोकपाल, कड़े कानून, डंडा लाने का वादा किया जाता है, दो जूनियर कर्मचारियों को बर्खास्त कर दिया जाता है. लेकिन यह कोई नहीं पूछता कि इस लोकपाल, कड़े कानून, डंडा चलाने वाले सरकारी कर्मचारी और उनके आका क्या मंगल गृह से आएंगे जो वह एकदम से निष्ठावान हो जायेंगे?
अतः इस भ्रष्ट सिस्टम से निपटने का उपाय क्या है?
उत्तर है भारत के व्यवसायों को टैक्स देने के लिए प्रेरित करना, औपचारिक क्षेत्र में रोज़गार का सृजन करना, और हर नागरिक का सशक्तिकरण करना.
GST के कारण अब 65 लाख व्यवसायों को अब टैक्स देना पड़ रहा है चूंकि कर चुकाने के बाद ही टैक्स क्रेडिट अर्जित होगा. उद्यमों का कुल व्यापार GST के कारण सब को पता चल जाता है; अतः उन उद्यमों को अब अपनी आय का खुलासा करना पड़ता है और आयकर देना होगा. इसके कारण 13 लाख करोड़ टैक्स मिलने का अनुमान है जो पिछले वर्ष की तुलना में लगभग 12 प्रतिशत अधिक है.
वर्ष 2013-14 में कुल 3.82 करोड़ लोगो ने आयकर रिटर्न फाइल किया जिन्होंने 6.38 लाख करोड़ रुपये आयकर में दिए. वर्ष 2017-18 में कुल 6.86 करोड़ लोगो ने आयकर रिटर्न फाइल किया और 10.02 लाख करोड़ टैक्स दिया. क्या यह क्रन्तिकारी परिवर्तन नहीं है?
स्वतंत्रता के बाद पिछले साल जून तक 66 लाख पंजीकृत उद्यम थे. GST के कारण सिर्फ एक साल में 48 लाख नए उद्यम पंजीकृत हो गए. इसके कारण 41 लाख नए रोजगार आठ महीने में (सितम्बर 2017 से अप्रैल 2018 तक) औपचारिक क्षेत्र में क्रिएट हो गए. मुद्रा के तहत 12 करोड़ से अधिक लोन दिए गए हैं. क्या यह उम्मीद करना अनुचित है कि एक लोन कम से कम एक व्यक्ति के लिए आजीविका के साधनों का निर्माण या समर्थन करेगा?
पिछले एक साल में एक करोड़ से अधिक घरों का निर्माण किया गया है; यह कितना रोजगार पैदा करेगा? यदि सड़क निर्माण प्रति माह दोगुनी से अधिक है, यदि रेलवे, राजमार्ग, एयरलाइंस आदि में जबरदस्त वृद्धि हुई है, तो यह क्या इंगित करता है? क्या यह कार्य अधिक लोगों को रोजगार के बिना यह संभव है?
यह है व्यवस्था में आमूलचूल परिवर्तन जिसमें अधिकतर रोजगार औपचारिक क्षेत्र में होंगे, व्यवसायियों को टैक्स भरना होगा और उस टैक्स से देश का विकास होगा, जिससे भारत कुछ ही वर्षों में विकसित राष्ट्र की श्रेणी में आ जाएगा.
प्रधानमंत्री मोदी भारत की भ्रष्ट संरचना को बदल रहे हैं. उस संरचना को जिससे अभिजात वर्ग ने आम भारतीयों का शोषण करके अपने परिवार और खानदान को राजनैतिक और आर्थिक सत्ता के शीर्ष पर बनाए रखा.

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