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भारत के इतिहास का दोगलापन-

हम लोगो के बचपन में जब स्कूल की पुस्तको की शुरू होती है तब हमारे इतिहास का सबसे पहले परिचय, भारत के महापुरुषों की गाथाओ से होता है। माता पिता भी जो पुस्तके या कॉमिक्स हमारे सामने रखते है, वह भी उन्ही से ही भरा होता हैं।

उसके माध्यम से हमे जो शिक्षा दी जाती है वह अहिंसा की, सत्य की, न्याय की और लिपियों में बन्द धर्म की होती है। यह सब तो होता है लेकिन उन पुस्तको इन कॉमिक्सों में राष्ट्रवाद नही होता है। हमारा जिन राष्ट्रिय नायको से परिचय कराया जाता है वे या तो अहिंसा, न्याय, सत्य और धर्म के पुजारी होते है या फिर, कुछ अपवादों को छोड़ कर, असफल हो कर पराधीनता के द्वार खोलते हैं।

हमारी असली दिक्कत तब आती है जब हम आगे यह पढ़ते है कि हमारे नायकों को जिन लोगो ने पराजित किया या उनको जन्होने मारा, उनका परिचय देते हुये हमारा ही इतिहास महान बताता है और साथ मे बड़े विस्तार से यह भी बताता है कि भारत में आज जो भी श्रेष्ठ दिखता हैं वह या तो उनकी देन है या फिर उनकी ही नींव पर खड़ा हुआ है।

वर्तमान में लिखे गये इतिहास का यही विरोधाभास हमारे अंदर एक ऐसी विभंग नीव पर आधारित चरित्र का निर्माण कर जाती है जो हमे न सिर्फ मानसिक रूप से अपंग बना जाती हैं बल्कि स्वाभिमान के रूप में, विक्षिप्त सा अहंकार और हीनता दे जाती हैं। इसका एक कारण यह भी है कि हम लोग शताब्दियों से विदेशियों से हारे व उनकी दासता को स्वीकार कर जीने वाली प्रजाति का प्रतिनिधित्व करते है। हम लोग इतने वर्षो से दासता की बेड़ियों में बंधे थे की जब 1947 में हमारी बेड़ियां खुली, तब भी हम उसमे ही बंधा महसूस करते रहे और अपने कदमो को बढ़ाने में हिचकिचाते रहे हैं।

यह सब जो कुछ हमारे साथ हुआ है वह सब इसी अहिंसा, सत्य, न्याय और लिपियों में सीमित धर्म ने किया धराया है। लेकिन यह सब सिर्फ दासों का सर्वग्राह्य होता है क्योंकि एक दास के लिए अहिंसा उसकी कायरता को ढकने का आवरण बन जाता है। सत्य, एक दास के लिये सिर्फ उसकी जीविका का प्रबंधन बन जाता है। एक दास के लिये न्याय की परिभाषा उसके स्वामी के हित और उसका दासता के लिये मिल रहे पारितोषिक से ज्यादा नही होती है और एक दास के लिये धर्म की व्याख्या, उसके हालातो से किये जारहे समझौतों को धर्मसम्मत मनवाने से ज्यादा नही होती है।

इन दासों के लिये स्वतंत्र होने की अनुभूति या राष्ट्रवाद की गूढ़ता को अपने अंदर उतराने की क्षमता का ह्रास हो चुका होता है। मेरे लिये यह अहिंसा,सत्य, न्याय और धर्म सिर्फ एक संबल है जो लोगो की नियति नही बनाते है बल्कि सिर्फ एक अच्छे दास बनाते है।

मैंने अब तक जितना इतिहास पढा है, वह चाहे भारत का हो या फिर विश्व के अन्य कोने का हो, उसमे मैं ने यह कई बार देखा हैं की, विश्व की वे तमाम सभ्यतायें, संस्कृति और राष्ट्र, जिन्हें मुझे यह लगता था कि उनको जीवित रहना चाहिये था वे इस धरा से हमेशा के लिये समाप्त हो गये। मैं ने जब उनके नष्ट हो जाने के कारणों की मीमांसा की तब यह बात समझ मे आयी कि जो सभ्यतायें, उनके राष्ट्र व उनकी संस्कृति ऐसे समूह का जमावड़ा थे जो शांति प्रिय थे, जो बौद्धिक रूप से तृप्त थे और जो आत्मसंतुष्ट थे, वे यह सब उपार्जित करने के बाद भी वे हर ऐसी शक्ति द्वारा नष्ट कर दिये गये, जो उनसे बौद्धिक व सांस्कृतिक रूप में काफी पीछे थी।

उनका अस्तित्व समाप्त ही इसी लिये हुआ क्यूंकि वे सब कुछ थे लेकिन शक्तिशाली नही थे। उनके अंदर "श्रेष्ठ" होने के स्वाभिमान ने, अहंकार का रूप ले लिया था और विश्व के परिवर्तनों से अनिभिज्ञ वे अपने मे ही निश्चिंत हो गये थे।

आज वर्तमान के भारत के नव दास इसी त्रासदी से गुजर रहे हैं। उन्हें अहिंसा, सत्य, न्याय और लिपियों में जकड़े धर्म की जड़ता ने उनको इतिहास का ही बंदी बना दिया हैं। वे सब देख रहे है और समझ भी रहे है, लेकिन बस, उन्हें राष्ट्र नही देखता है और न ही राष्ट्र को ही समझते हैं।

मेरा मानना है कि इन नव दासों पर कभी भी दया की संवेदनशीलता नही दिखानी चाहिये और न ही इनकी अपंग हो गयी बौद्धिकता से शास्त्रार्थ करना चाहिए क्यों की इन्होने अपने आप ही समझ के, नये विचारों और ऊर्जाओं के लिए द्वार बंद कर दिये हैं।

आज हमारे ऐसे लोगो की दुविद्धा यह हैं की हमे निर्णय करना है और यह निर्णय भूतकाल के दासों और वर्तमान के नव दासों को समझते हुए लेना हैं।

हम को निर्णय यह लेना है की राष्ट्र ऊपर है या अहिंसा?
हम को निर्णय यह लेना है की राष्ट्र ऊपर है या सत्य?
हम को निर्णय यह लेना है की राष्ट्र ऊपर है या न्याय?
और हम को यह भी निर्णय लेना है की राष्ट्र ऊपर है या लिपियों तक सीमित धर्म?

आज का काल निर्णय का काल है और इसको हमे तो लेना ही होगा।

क्योंकि हमारी प्रजाति के पास कोई विकल्प नही है।

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